रामलाल साहनी की रिपोर्ट
- युग पुरुष स्व. श्री छविले मिश्रा जी को शब्दांजलि
माता शिव दुर्गा की छाया थी, बप्पा प्यारे का अभिमान रहा।
जिसका पूरा जीवन संघर्ष रहा,काल से भी दो-दो हाथ रहा।
जिस पर मां की छाया थी,उस पर आंच कभी ना आनी थी।
विंध्याचल का वो सरदार रहा,छविले मिश्रा उनका नाम रहा।
उन पर माता विंध्यवासिनी,अपनी अपनी करुणामयी कृपा बरसाती थी।
विंध्याचल का पावन धाम,माता विंध्यवासिनी का वास।
मां उनका हर मनोरथ, सम्पूर्ण करती थीं खास।
पथ प्रदर्शक, ज्ञान के भंडार, उन पर पूर्वजों का आशीर्वाद।
ऐसे महान पुरोधा के चरणों में , श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
उनका व्यक्तित्व निराला था, मस्तक पर तेज दमकता था।
वो कांटों में राह बनाते थे, बिछड़ों को गले लगाते थे।
उनकी आह निकलती थीं, तब उथल पुथल मच जाता था।
तब परिवर्तन दिख जाता था, गिरा हुआ उठ जाता था, रोता मनुष्य हंस देता था।
संकट में साथ निभाते थे, शूलों का मूल मिटाते थे।
उन्होंने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया।
जो स्वयं तेज भयकारी हो, चिंगारी जिसकी पटरानी हो।
जिस पर प्रसन्न मां विंध्यवासिनी हो, जो सब की पालन हारी हो।
इन्होंने शिक्षा जगत में काम किया, मां सरस्वती की कृपा रहीं।
कई पुस्तक की रचना कर, मां विंध्यवासिनी का मान किया।
कॉलेज प्रबंधन भी करके, विंध्याचल के आंचल में शिक्षा का अमिट दीप जलाया हैं।
मैं जितना लिखता जाता हूं, शब्द कम पड़ते जाते हैं।
उनकी ज्योति देख देख, श्रद्धा सुमन चढ़ाता हूं।
मैं महान पुरोधा के चरणों में, अपना शीश नवाता हूं।







